हे पथिक करना विरोध तू,
हे पथिक करना विरोध तू,
भ्रष्टाचार की इन गलियों का,
चाहे शीतल मंद बयार बहे,
चाहे सुर सरिता की धार बहे।
चाहे धन संचय की पुकार कहे,
चाहे वैभव की ललकार कहे,
तू पथ भ्रमित मत हो जाना।
तू वित्त गृहीत मत कहलाना।
हे पथिक करना विरोध तू
भ्रस्टाचार की इन गलियों का।
चाहे मीठे रस की लार मिले,
चाहे माया रुपी संसार मिले ,
चाहे कृतिम पुष्प हजार खिले,
चाहे द्रव्य, कीमती पदार्थ मिले,
तू तार तार मत कर जाना।
तू विष कटक मत बो जाना।
हे पथिक करना विरोध तू,
भ्रष्टाचार की इन गलियों का।
सागर का मंथन कर फिर से,
अमृत का फिर प्रपात बहा
शिव रूपी वो कंठ बनाकर,
तू विष का जमघट पीते जाना।
हे पथिक करना विरोध तू,
भ्रष्टाचार की इन गलियों क।
राष्ट्र समर्पित कर, सब अभिलाषाएं,
अब कलम उठा, उठा ध्वजा तू,
राण में कूद चल तलवार उठा,
कर अस्त-व्यस्त इन आक्रांताओं को ।
भारत भूमि को अब बना स्वर्ग तू,
हे पथिक करना विरोध तू
भ्रष्टाचार की इन गलियों का।
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सागर का मंथन कर फिर से, अमृत का फिर प्रपात बहा शिव रूपी वो कंठ बनाकर, तू विष का जमघट पीते जाना।
हे पथिक करना विरोध तू, भ्रष्टाचार की इन गलियों क।
राष्ट्र समर्पित कर, सब अभिलाषाएं, अब कलम उठा, उठा ध्वजा तू, राण में कूद चल तलवार उठा, कर अस्त-व्यस्त इन आक्रांताओं को । भारत भूमि को अब बना स्वर्ग तू, हे पथिक करना विरोध तू भ्रष्टाचार की इन गलियों का।
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