कैसा कर्ज
स्वप्न धूमिल से पड़ गए , मन खुले आसमान में कौँधती बीजली सा विचलित है । ऐसा विचित्र अकेलापन पहले कभी न था , सब तो है मेरे पास रुपया पैसा रिश्ते - नाते दोस्त - शत्रु तमाम दुनियादारी फिर भी घण्टो खुद में खुद के सवालो से जुझता रहता हूँ । डरा सा सहमा सा रहने लगा हूँ , किसका डर मालूम नहीं ? कैसा डर समझ नहीं आता , ऐसा लगता है जैसे मेरे मेरे कानो के पास से उफान मारती भयानक अवाज वाली रेलगाडी गुजर गई हो और मैं कुछ एक पल के लिए स्तब्ब सा हो गया हूँ कुछ देखने सुनने का जी नहीं करता पढ़ने की तो बात ही क्या बताऊ कोई नयी या पुरानी किताब भी अनजानी सी लगती है । जैसे उसकी भाषा - शैली मैंने कभी पहले अनुभव ही ना की हो।
पढने अगर बैठा भी तो उसके शब्द तो मन में तैरते है पर मन की सुनामी में ज्यादा देर टिक नहीं पाते और अनसुलझे - अनकहे विचारों से थक हार कर मानो बैठ से जाते है। इतनी कम उम्र में इतना बोझ लगता है , मुझे कर्ज से लदे किसान की भाति ले डूबेगा। मैं महाजन के कर्ज से निकल नहीं पाऊगा उसका ब्याज रूपी नाग मुझे इस कर मेरी सारी कौधती - धधकती कल्पनाओं को शात कर देगा। अच्छा भी रहेगा मैं भी तो इस उहा - पोह से शांत वातावरण की ओर लौटना चाहता हूँ । पर लगता है अभी कर्ज भी तो चुकाना है बिना लौटाए चला गया तो मेरी आत्मा भी अशान्त रहेगी।
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